Meri aawaj

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Thursday, March 10, 2016

गर आईना दिखाता चेहरों के परे


गर आईना दिखाता चेहरों के परे;
तो कई घरों में आईने टूटे होते।

कुछ रिश्ते इकतरफा निभाये हमने;
यूँ न होता तो कई अपने छूटे होते।

सितमगरो का यूँ ना होंसला बढता;
सितमपरस्त गर हमेशा चीखे होते।

जिंदगी ने जम के पिलायी साकी;
वरना हम मैकदे में बैठे पीते होते।

बेंच कर ईमान सब बड़ गए आगे;
हमने भी बेंचा हम क्यों पीछे होते।

वो ले के गया मेरे हिस्से की बहार;
वरना हमारे वीराने भी बगीचे होते।

गर आईना दिखाता चेहरों के परे;
तो कई घरों में आईने टूटे होते।

-अभिषेक खरे
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1 comment:

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